لا يغتفر !

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ذاكَ المساءُ وأيّ يومٍ مثلُهُ
كانت نهاية حُبّنا
من كِلْمةٍ ألقيتُها
ناديتُكِ،
لم أنتبهْ
إلا وقد ساءَلتِني
في دهشةٍ:
من ذي تكونْ؟!

وتلعثمتْ منّي الشفاهُ
وقلتُ: أنتِ حبيبتي
لا غيرُكِ..

فصرختِ بي
غضبى، وصوتكِ هادرٌ كالعاصفة:
ما أكذبَكْ!
عشرون عاماً
بل تزيدْ
وتقولُ عفواً بعد هذا؟!

متوجّسا:
أ حبيبتي..
ما همَّ اسمٌ؟
إنّ قلبي يُقسمِ أنّكِ
من تملِكُهْ.
مستعطفاً:
جُلُّ الذنوبِ
صغيرُها وكبيرُها
مغفورةٌ عند الإله..

قاطعتِني:
هذا الإلهُ ولا سواه
في مَنّه
في رحمته،

لكنّما.. في عُرفنا
نحن البشر..
ما أيّ ذنب
يُغتفرْ!

9.1.2016

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